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Sunday, April 13, 2014

मोदी के गुजरात से



लौह पुरुष की दहलीज पर दम तोड़ते 
गुजरात विकास के दावे
शाहिद मिर्जा

एक ओर नरेन्द्र मोदी सरदार बल्लभ  भाई पटेल के नाम से नर्मदा पर स्टेच्यू आॅफ यूनिटी बनाने के लिए देश भर से लोहा एकत्र करके अपने प्रेम उमड़ने का ढिंढोरा पीट रहे हैं। दूसरी ओर सरदार पटेल के नाम पर बने स्मारक और उनके पैतृक घर तक पहुंचने वाले रास्तों की हालत और व्याप्त गंदगी गुजरात में विकास के सभी  दावों की पोल खोल रही हैं।




विकास माडल के रूप में प्रचारित किए जा रहे गुजरात राज्य में एक जिला आणंद है। वर्तमान में इस जिले को अमूल के कारण देश-विदेश ने पहचान हासिल है। इसी जिले में एक स्थान करमसद गांव के नाम से जाना जाता है। नगर पालिका आणंद के दायरे में आने वाले करमसद गांव में जन्म लेने वाली हस्ती को दुनिया भर में लौह पुरुष के रूप में जाना जाता है। जी हां! लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल, जिनका पैतृक घर करमसद में आज भी उसी अवस्था में मौजूद है, जैसा उनके जीवनकाल में रहा है। लकड़ी के दरवाजे, सीढ़ियां कहीं कहीं कच्चा फर्श, लकड़ी की ही कड़ियां देखने वालों को कई दशक पुराने माहौल की अनुभूति कराता है। मकान के लगभग सभी कमरों में उनके जीवनकाल से संबंधित चित्रों के अलावा यहां पहुंचकर श्रद्धा सुमन अर्पित करने वाले राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी, नरेन्द्र मोदी समेत विभिन्न हस्तियों के चित्र दीवारों की शोभा बढ़ा रहे हैं। एक कमरे में अखंड ज्योति भी जलाई गई है। जिसकी देखभाल राजस्थान का मारवाड़ी परिवार कर रहा है। इस परिवार कि मंजुलाबेन मारवाड़ी का कहना है कि सरदार स्मारक के ट्रस्टी स्मारक की देखभाल करते हैं। और जरुरत पड़ने पर मरम्मत भी कराते हैं। लेकिन राज्य सरकार की ओर से इस स्मारक के रखरखाव के लिए कोई मदद नहीं की जा रही है। यहां तक कि देखरेख करने वाले परिवार के लिए भी किसी प्रकार के वेतन आदि की कोई व्यवस्था नहीं है। इस जगह सरदार पटेल के जन्म दिवस व पुण्यतिथि पर राजनेता आते हैं, लेकिन बाकी दिनों में कोई सुध लेने वाला नहीं होता।
इसके अलावा करमसद में एक भव्य स्मारक भी बनाया गया है। लौहपुरुष सरदार पटेल के साथ साथ इस स्मारक के साथ बिट्टलभाई पटेल को भी समर्पित किया गया है। सरदार बल्लभ भाई पटेल की स्मृति में स्मारक बनाने का भले ही व्यापक प्रचार किया जा रहा हो, लेकिन इस गांव में आने वालों का अनुभव मोदी के गुजरात विकास माडल की पोल खोलने के लिए काफी है। स्मारक के बाहर दीवार के आसपास गंदगी के ढेर सफाई की पोल खोल देते हैं। जबकि सरदार पटेल के घर के लिए जाने वाले रास्तों की हालत विकास के दावों को खोखला साबित कर देती है। इन रास्तों को देखकर उत्तर प्रदेश के गांवों की खस्ताहाल सड़कों की बरबस ही याद आ जाती है। कुछ देर के लिए लगता है कि उत्तर प्रदेश के कस्बों का सफर किया जा रहा है। क्षेत्र के लोग बताते हैं कि विकास की सारी बातें बड़े शहरों तक सीमित हैं। आज भी गुजरात के कस्बे और गांव उन दावों के अमलीजामा पहनाए जाने की बाट जोह रहे हैं, जिनको लेकर देश विदेश में माडल बनाकर प्रचारित किया जा रहा है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि उनके लिए सबसे ज्यादा दुख की बात यही है कि जिन लौहपुरुष के नाम को भुनाने का प्रयास किया जा रहा है, उनके घर और स्मारक तक आने वाले पर्यटकों के बीच इतना खराब संदेश जा रहा है। जिस पाठशाला में सरदार पटेल ने शिक्षा पाई उसे राज्य सरकार ने सरदार स्मारक ट्रस्ट को आवंटित किया है। लेकिन ट्रस्ट ने यहां सरदार स्मारक बनाने की योजना तैयार कर अनुदान के लिए जब मोदी सरकार को भेजी, तो मोदी सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। आज पाठशाला खंडहर बनी हुई है।

‘‘मोदी सरकार विकास के नाम पर केवल ढिंढोरा पीट रही है। जमीनी हकीकत इससे कोसो दूर है। गुजरात के शहरों में गांवों की स्थिति में नजर आने अंतर से इस बात का साफ प्रमाण मिलता है। नरेन्द्र मोदी ने गुजरात की जनता को एक वर्ग विशेष के प्रति नफरत फैलाकर सत्ता हासिल की है। लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में जनता उनके बहकावे में आने वाली नहीं है।’’

            
 कांतिभाई जिलाध्यक्ष कांग्रेस कमेटी आणंद गुजरात

Monday, April 7, 2014

तारे गिनता रहा आसमां देर तक

साहेबान बहुत दिनों बाद आज एक ग़ज़ल हाज़िर है
















नज़रें करती रहीं कुछ बयां देर तक
हम भी पढ़ते रहे सुर्खियां देर तक
आओ उल्फ़त की ऐसी कहानी लिखें
ज़िक्र करता रहे ये जहां देर तक
बज़्म ने लब तो खुलने की मोहलत न दी
एक खमोशी रही दरमियां देर तक
मैं तो करके सवाल अपना खामोश था
तारे गिनता रहा आसमां देर तक
देखकर चाक दामन रफ़ूगर सभी
बस उड़ाते रहे धज्जियां देर तक
कुछ तो तारीकियां ले गईं हौसले
कुछ डराती रहीं आंधियां देर तक
वो बहारों का मौसम बदल ही गया
देखें ठहरेंगी कैसे खिज़ां देर तक
कोई शाहिद ये दरिया से पूछे ज़रा
क्यों तड़पती रहीं मछलियां देर तक
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Wednesday, March 5, 2014

डाली मोगरे की - नीरज गोस्वामी

नीरज गोस्वामी 

इस नाम से ब्लॉग जगत में भला कौन नावाकिफ़ हैं
किताबों की दुनिया के नाम से 2008 में शुरू किये गये सिलसिले के तहत आपने शेर-शायरी की अब तक 90 किताबों की समीक्षा इतनी खूबसूरती से की है, कि पढ़ने वाले के दिल में किताब लेने की ख्वाहिश जाग जाती है. शायरी के प्रति ऐसी दीवानगी रखने वाले नीरज गोस्वामी की खुद की शायरी आज

                           डाली मोगरे की 
के रूप में मज़रे-आम पर है. इस किताब के बारे में कई समीक्षा
वंदना गुप्ता  सत्या व्यास  मयंक अवस्थी श्रीमती पारुल सिंह  जैसे अनुभवी पहले भी प्रकाशित कर  चुके  हैं, जिनमें बहुत कुछ कहा जा चुका है. दैनिक जनवाणी में भी इसे प्रमुखता से लिया गया है 
मेरा बस इतना मानना है कि ज़िन्दगी के उन अछूते पहलुओं को शायरी की ज़बान में देखने के लिये डाली मोगरे की बहुत ज़रूरी है, जिन्हें हम ल्फ़्ज़ों का जामा नहीं पहना पाते, और जब नीरज जी की किताब में वो सब पढ़ते हैं, तो यक़ीन मानिये, अपने ही दिल की बात लगती है.
अपनी शायरी के बारे में खुद नीरज जी कहते हैं-
 कहीं बच्चों सी किलकारी कहीं यादों की फुलवारी
   मेरी ग़ज़लों मे बस नीरज यही सामान होता है
सचमुच ऐसे लोगों से हम-आप रोज़ाना दो-चार होते हैं, जिनके बारे में नीरज जी कहते हैं-
 जीतने के गुर सिखाते हैं वही इस दौर में
 दूर तक जिनका नहीं रिश्ता रहा मैदान से
उनकी सलाह दोस्तों के लिये ही नहीं, दुश्मनों के लिये भी मश्वरा देते हुए कहते हैं-
मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यों हो
सियासत के लिये इससे खूब्सूरत अल्फ़ाज़ में भला और क्या नसीहत हो सक्ती है-
भूख से बिलबिलाते लोगों को
कायदे मत सिखाईये साहब
अपने ग़म छुपाने का ये अंदाज़ कितना प्यारा लगता है-
खार पर तितलियां नहीं आतीं
फूल सा मुस्कुराईये साहब
इंसान ज़िन्दगी भर चेहरों की परत के पीछे अपने को तलाश करने की कोशिश करता है,
ऐसे में नीरज जी बस दो मिसरों में फ़रमाते हैं-
दुश्मन को पहचानोगे
अपनों को पहचाना क्या
सेवा धर्म को लेकर कोई व्याख्यान करने के बजाय कहते हैं-
डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियां
बस वही पूजा की थाली हो गई
दीवारें घरों में ही नहीं उठीं, आपसी संबंधों के हालात क्य हो चुके हैं,
बकौल शायर-
तुझमें बस तू बसा है मुझमें मैं
अब के रिश्तों में हम नहीं होता
सहनशीलता की सीमा के पार जाने वालों के लिये एक चेतावनी भी देते हैं-
शराफ़त का तकाज़ा है तभी खामोश है नीरज
फिसल जाये ज़बां इतना कभी लाचार मत करना
नीरज जी के इस हुनर को सलाम.
यहां कुछ बानगी पेश की गई हैं....
अपना एक शेर भी याद आ रहा है...
ये किताब शायद यही कह रही है-
देखने वालो कभी मुझमें उतरकर देखो
चंद कतरों से समंदर नहीं देखा जाता
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद




Friday, November 2, 2012

करवा चौथ

हज़रात,
फ़िलहाल काफ़ी कुछ ऐसा है, जो नियमित रूप से नहीं चल रहा है...
बहरहाल....
करवा चौथ के मौके पर कही गई एक नज़्म हाज़िर है...
उम्मीद है पसंद फ़रमाएंगे-

नज़्म
मेरे सपनों का जहां तुझमें बसा है प्रियतम
तेरी खुशियां ही तो सिंगार मेरा है प्रियतम

तुमको पाया तो लगा पाया ज़माना जैसे
मेरे दामन में हो खुशियों का ख़ज़ाना जैसे

अब्र उठता है मुहब्बत का तेरी आंखों से
और बारिश में नहा के मैं निखर जाती हूं

तेरे चेहरे पे नज़र आती है मुस्कान मुझे
ग़म के अहसास से मैं खु़द ही उबर जाती हूं

मेरे मोहसिन मेरे सरताज मुहाफ़िज़ मेरे
चांद सी उम्र हो तेरी ये दुआ करती हूं
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद




Thursday, September 20, 2012

परी कथाएं भी अब तो ”परी कथाएं” हैं

 हज़रात, 
एक सादा सी ग़ज़ल हाज़िर है-

अजब वफ़ा के उसूलों से ये ”वफ़ाएं” हैं
तेरी जफ़ाएं, ”अदाएं”, मेरी ”ख़ताएं” हैं

महकती जाती ये जज़्बात से फ़िज़ाएं हैं
कोई कहीं मेरे अश’आर गुनगुनाएं हैं

वो दादी-नानी के किस्सों की गुम सदाएं हैं
परी कथाएं भी अब तो ”परी कथाएं” हैं

ज़ेहन में कैसा ये जंगल उगा लिया लोगो
जिधर भी देखिए, बस हर तरफ़ अनाएं हैं

बिगडते रिश्तों को तुम भी संभाल सकते थे
मैं मानता हूं ...मेरी भी..... कई ख़ताएं है

मेरे ख़्यालों में करती हैं रक़्स ये शाहिद
तुम्हारी याद की जितनी भी अप्सराएं हैं

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद