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Monday, November 10, 2014

चुप रहा था मैं


कहीं सब कुछ न हो जाए उजागर चुप रहा था मैं
तुम्हारे दिल की चौखट तक भी आकर चुप रहा था मैं

अब ऊंचा बोलने का तुम मुझे इल्जाम मत देना
तुम्हारे नर्म लहजे तक बराबर चुप रहा था मैं।

मेरी सीधी सी बातों के कई मतलब न वो समझें
बहुत कुछ कहने की हसरत तो थी पर चुप रहा था मैं

ये आसां भी था मुमकिन भी मुनासिब भी जरूरी भी
बदलते देख तुमको, खुद बदलकर चुप रहा था मैं

सदा दिल की वो सुन लें बस इसी उम्मीद में शाहिद
बहुत हौले से इक दर खटखटाकर चुप रहा था मैं।

शाहिद मिर्जा शाहिद


Thursday, October 2, 2014

सम्मानित जनो,
आज ही दिन पांच साल पहले ब्लागिंग शुरू की थी। इन पांच सालों में कितना अंतर आ गया है। आज ब्लागिंग के बजाय फेसबुक की ओर लोगों का अधिक रुझान रहने लगा है।
खैर... आज गांधी जयंती पर एक पुराना कताअ पेश है-

अहिंसा के मसायल पर रजा अपनी भी रखते हैं।
कोई बुजदिल समझ बैठे दवा इसकी भी रखते हैं।
हमारे सब्र की इक हद है इसको पार मत करना
हैं गांधी भी, मगर हम हाथ में लाठी भी रखते हैं।
                     -शाहिद मिर्जा शाहिद

Monday, April 7, 2014

तारे गिनता रहा आसमां देर तक

साहेबान बहुत दिनों बाद आज एक ग़ज़ल हाज़िर है
















नज़रें करती रहीं कुछ बयां देर तक
हम भी पढ़ते रहे सुर्खियां देर तक
आओ उल्फ़त की ऐसी कहानी लिखें
ज़िक्र करता रहे ये जहां देर तक
बज़्म ने लब तो खुलने की मोहलत न दी
एक खमोशी रही दरमियां देर तक
मैं तो करके सवाल अपना खामोश था
तारे गिनता रहा आसमां देर तक
देखकर चाक दामन रफ़ूगर सभी
बस उड़ाते रहे धज्जियां देर तक
कुछ तो तारीकियां ले गईं हौसले
कुछ डराती रहीं आंधियां देर तक
वो बहारों का मौसम बदल ही गया
देखें ठहरेंगी कैसे खिज़ां देर तक
कोई शाहिद ये दरिया से पूछे ज़रा
क्यों तड़पती रहीं मछलियां देर तक
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Wednesday, March 5, 2014

डाली मोगरे की - नीरज गोस्वामी

नीरज गोस्वामी 

इस नाम से ब्लॉग जगत में भला कौन नावाकिफ़ हैं
किताबों की दुनिया के नाम से 2008 में शुरू किये गये सिलसिले के तहत आपने शेर-शायरी की अब तक 90 किताबों की समीक्षा इतनी खूबसूरती से की है, कि पढ़ने वाले के दिल में किताब लेने की ख्वाहिश जाग जाती है. शायरी के प्रति ऐसी दीवानगी रखने वाले नीरज गोस्वामी की खुद की शायरी आज

                           डाली मोगरे की 
के रूप में मज़रे-आम पर है. इस किताब के बारे में कई समीक्षा
वंदना गुप्ता  सत्या व्यास  मयंक अवस्थी श्रीमती पारुल सिंह  जैसे अनुभवी पहले भी प्रकाशित कर  चुके  हैं, जिनमें बहुत कुछ कहा जा चुका है. दैनिक जनवाणी में भी इसे प्रमुखता से लिया गया है 
मेरा बस इतना मानना है कि ज़िन्दगी के उन अछूते पहलुओं को शायरी की ज़बान में देखने के लिये डाली मोगरे की बहुत ज़रूरी है, जिन्हें हम ल्फ़्ज़ों का जामा नहीं पहना पाते, और जब नीरज जी की किताब में वो सब पढ़ते हैं, तो यक़ीन मानिये, अपने ही दिल की बात लगती है.
अपनी शायरी के बारे में खुद नीरज जी कहते हैं-
 कहीं बच्चों सी किलकारी कहीं यादों की फुलवारी
   मेरी ग़ज़लों मे बस नीरज यही सामान होता है
सचमुच ऐसे लोगों से हम-आप रोज़ाना दो-चार होते हैं, जिनके बारे में नीरज जी कहते हैं-
 जीतने के गुर सिखाते हैं वही इस दौर में
 दूर तक जिनका नहीं रिश्ता रहा मैदान से
उनकी सलाह दोस्तों के लिये ही नहीं, दुश्मनों के लिये भी मश्वरा देते हुए कहते हैं-
मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यों हो
सियासत के लिये इससे खूब्सूरत अल्फ़ाज़ में भला और क्या नसीहत हो सक्ती है-
भूख से बिलबिलाते लोगों को
कायदे मत सिखाईये साहब
अपने ग़म छुपाने का ये अंदाज़ कितना प्यारा लगता है-
खार पर तितलियां नहीं आतीं
फूल सा मुस्कुराईये साहब
इंसान ज़िन्दगी भर चेहरों की परत के पीछे अपने को तलाश करने की कोशिश करता है,
ऐसे में नीरज जी बस दो मिसरों में फ़रमाते हैं-
दुश्मन को पहचानोगे
अपनों को पहचाना क्या
सेवा धर्म को लेकर कोई व्याख्यान करने के बजाय कहते हैं-
डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियां
बस वही पूजा की थाली हो गई
दीवारें घरों में ही नहीं उठीं, आपसी संबंधों के हालात क्य हो चुके हैं,
बकौल शायर-
तुझमें बस तू बसा है मुझमें मैं
अब के रिश्तों में हम नहीं होता
सहनशीलता की सीमा के पार जाने वालों के लिये एक चेतावनी भी देते हैं-
शराफ़त का तकाज़ा है तभी खामोश है नीरज
फिसल जाये ज़बां इतना कभी लाचार मत करना
नीरज जी के इस हुनर को सलाम.
यहां कुछ बानगी पेश की गई हैं....
अपना एक शेर भी याद आ रहा है...
ये किताब शायद यही कह रही है-
देखने वालो कभी मुझमें उतरकर देखो
चंद कतरों से समंदर नहीं देखा जाता
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद




Friday, November 2, 2012

करवा चौथ

हज़रात,
फ़िलहाल काफ़ी कुछ ऐसा है, जो नियमित रूप से नहीं चल रहा है...
बहरहाल....
करवा चौथ के मौके पर कही गई एक नज़्म हाज़िर है...
उम्मीद है पसंद फ़रमाएंगे-

नज़्म
मेरे सपनों का जहां तुझमें बसा है प्रियतम
तेरी खुशियां ही तो सिंगार मेरा है प्रियतम

तुमको पाया तो लगा पाया ज़माना जैसे
मेरे दामन में हो खुशियों का ख़ज़ाना जैसे

अब्र उठता है मुहब्बत का तेरी आंखों से
और बारिश में नहा के मैं निखर जाती हूं

तेरे चेहरे पे नज़र आती है मुस्कान मुझे
ग़म के अहसास से मैं खु़द ही उबर जाती हूं

मेरे मोहसिन मेरे सरताज मुहाफ़िज़ मेरे
चांद सी उम्र हो तेरी ये दुआ करती हूं
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद