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Thursday, May 5, 2016

पत्थर भी घायल निकलेगा

एक ग़ज़ल
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हर मसअले का हल निकलेगा
आज नहीं तो कल निकलेगा
उसकी रज़ा शामिल हो जिसमें
उस ठोकर से जल निकलेगा
दुःख की गठरी खोल के देखो
कोई ख़ुशी का पल निकलेगा
दीवानों से पूछ के देखो
अहले-ख़िरद पागल निकलेगा
शीशे को तोड़ा है उसने
पत्थर भी घायल निकलेगा
तूने क्या सोचा था शाहिद
जल गई रस्सी बल निकलेगा
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शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Sunday, February 22, 2015

...अच्छा कहना भूल गया

हाज़िर है एक ग़ज़ल-

सारी वफ़ाएं सारी जफ़ाएं जाने क्या-क्या भूल गया
तुम छेड़ो तो याद आ जाए मैं तो किस्सा भूल गया

साथी मुझको लेकर चलना फिर बचपन की गलियों में
शायद ऐसा कुछ मिल जाए जिसको लाना भूल गया

हां मैं ऊंचा बोला था तस्लीम किया मैंने लेकिन
मेरी बातें याद रहीं खुद अपना लहजा भूल गया

अपना हर सामान समेटा लेकिन जल्दी-जल्दी में
मेरी आंखों में वो नादां अपना चेहरा भूल गया

तुम क्या रूठे लफ़्ज़ भी अब तो मुझसे रूठ गए शाहिद
सुनने वाले ये कहते हैं अच्छा कहना भूल गया

                             शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Monday, November 10, 2014

चुप रहा था मैं


कहीं सब कुछ न हो जाए उजागर चुप रहा था मैं
तुम्हारे दिल की चौखट तक भी आकर चुप रहा था मैं

अब ऊंचा बोलने का तुम मुझे इल्जाम मत देना
तुम्हारे नर्म लहजे तक बराबर चुप रहा था मैं।

मेरी सीधी सी बातों के कई मतलब न वो समझें
बहुत कुछ कहने की हसरत तो थी पर चुप रहा था मैं

ये आसां भी था मुमकिन भी मुनासिब भी जरूरी भी
बदलते देख तुमको, खुद बदलकर चुप रहा था मैं

सदा दिल की वो सुन लें बस इसी उम्मीद में शाहिद
बहुत हौले से इक दर खटखटाकर चुप रहा था मैं।

शाहिद मिर्जा शाहिद


Thursday, October 2, 2014

सम्मानित जनो,
आज ही दिन पांच साल पहले ब्लागिंग शुरू की थी। इन पांच सालों में कितना अंतर आ गया है। आज ब्लागिंग के बजाय फेसबुक की ओर लोगों का अधिक रुझान रहने लगा है।
खैर... आज गांधी जयंती पर एक पुराना कताअ पेश है-

अहिंसा के मसायल पर रजा अपनी भी रखते हैं।
कोई बुजदिल समझ बैठे दवा इसकी भी रखते हैं।
हमारे सब्र की इक हद है इसको पार मत करना
हैं गांधी भी, मगर हम हाथ में लाठी भी रखते हैं।
                     -शाहिद मिर्जा शाहिद

Monday, April 7, 2014

तारे गिनता रहा आसमां देर तक

साहेबान बहुत दिनों बाद आज एक ग़ज़ल हाज़िर है
















नज़रें करती रहीं कुछ बयां देर तक
हम भी पढ़ते रहे सुर्खियां देर तक
आओ उल्फ़त की ऐसी कहानी लिखें
ज़िक्र करता रहे ये जहां देर तक
बज़्म ने लब तो खुलने की मोहलत न दी
एक खमोशी रही दरमियां देर तक
मैं तो करके सवाल अपना खामोश था
तारे गिनता रहा आसमां देर तक
देखकर चाक दामन रफ़ूगर सभी
बस उड़ाते रहे धज्जियां देर तक
कुछ तो तारीकियां ले गईं हौसले
कुछ डराती रहीं आंधियां देर तक
वो बहारों का मौसम बदल ही गया
देखें ठहरेंगी कैसे खिज़ां देर तक
कोई शाहिद ये दरिया से पूछे ज़रा
क्यों तड़पती रहीं मछलियां देर तक
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद