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Tuesday, December 8, 2009

परदेसी

सभी हज़रात का तहे-दिल से शुक्रिया,
गीत को मेरी उम्मीद से ज्यादा पसंद करने के लिये

जनाब साहिर लुधियानवी साहब का एक शेर है-

दुनिया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक्ल में

जो कुछ मुझे दिया है, वो लौटा रहा हूं मैं

बस इतनी सी तम्हीद के साथ,

एक ग़ज़ल पेश-ए-खिदमत है

इत्तेफाक से,
मकते को छोडकर, सभी मतले हो गये हैं,

मुलाहिज़ा फरमायें-

कैसी बस्ती है ये कैसा है नगर परदेसी

'अपना' कहती है ज़बां, और नज़र 'परदेसी'

देके सींचेगा जिन्हें खूने-जिगर, परदेसी

छांव मांगेगा, नहीं देंगे शजर परदेसी

रख ज़माने की निगाहों पे नज़र परदेसी

सीख परदेस में जीने का हुनर परदेसी

ज़ुल्म जिनका है, हैं मुन्सिफ भी उधर परदेसी

किससे मांगे है तू इन्साफ इधर परदेसी

मेरी तन्हाई ने हर रोज़ ये पूछा 'शाहिद'

कैसे कटते हैं तेरे शाम-ओ-सहर परदेसी

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

17 comments:

Nasir said...

Assalamu Alaykum wwbr
kaise ho janab bohot dino baad hamara yahan aana hua mazirath chahte hain aur subhan Allah bohot hi khoob likha apne ham pardes me rehte hain apke kalam se kaafi sikhne ko mila likhte rahi Allah apke kalam ko jari rakhe aur sath hi deen ki khidmat bhi naseeb farmaye Aameeen

इस्मत ज़ैदी said...

shahid sahab ,assalam alaikum ,main samajh nahin paa rahi hoon ke kisi ek sher ki tareef kaise karoon .poori ghazal zamane ki sachchaiyon ko zahir karti hai ,mubarak ho .hamare yahan kaha jata hai ki shayar khud nahin likhta khuda likhwata hai ,to shayad khuda aap par zyada meharban hai .

Shahid Ansari said...

waise to saare sher ek se badhkar ek hain par ye sher

ज़ुल्म जिनका है, हैं मुन्सिफ भी उधर परदेसी
किससे मांगे है तू इन्साफ इधर परदेसी

bahut pasand aaya...

रचना दीक्षित said...

वाह शाहिद साहेब क्या खूब लिखा है कि मिलते नहीं है शब्द मुझे इस ग़ज़ल के बाद .आप प्रदेश की बात करते हैं हमने तो अपने देश में ही रह कर परदेसियों वाली प्रताड़ना झेली है " की ये बाहर गाँव के लोग ये पर प्रान्त के लोग " ये केवल महाराष्ट्र में ही नहीं और भी जगह होता है पर मैं नाम लिखना उचित नहीं समझती हूँ अजी जनाब मेरी पुरानी प्रतक्रिया से दो लाइने गायब कर दीं इतन बुरा तो नहीं लिखा था
बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

नीरज गोस्वामी said...

शाहिद साहब कायल हो गए हम तो आपकी इस ग़ज़ल को पढ़ कर...वल्लाह...क्या शेर कहें हैं...एक से बढ़ कर एक...अब किसी एक का जिक्र दूसरे के साथ ना इंसाफी होगी इसलिए येही कहता हूँ की एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिली दाद कबूल करें...
नीरज

A.U.SIDDIQUI said...

बहुत ख़ूब............

(आप के लिये)

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी तरह इस शहर में तन्हा होगा॥

padmja said...

शाहिद जी
आपने तो एक ही गजल में जुल्मी और मुंसिफ दोनों की क्लास ले ली .

Suman said...

nice

शबनम खान said...

शाहिद जी खूब लिखा है...

लता 'हया' said...

der se ahukria ada karne ke liye maazarat chahti hoon.mujhe yaad hai...mushaire ki mulaqat .
gazal ka maqta sitaron ke beech chand sa TANHA muskurata mahesoos hota hai.

अर्कजेश said...

सुंदर गजल ।
ज़ुल्म जिनका है, हैं मुन्सिफ भी उधर परदेसी
किससे मांगे है तू इन्साफ इधर परदेसी

बेहतरीन ।

pankaj bhai said...

wah shahid bhai bahut khub likha hai..

हास्यफुहार said...

बेहद पसंद आई।

dwij said...

रख ज़माने की निगाहों पे नज़र परदेसी

सीख परदेस में जीने का हुनर परदेसी

वाह-वाह
बहुत ख़ूब
दिल से मुबारिक
ख़ूबसूतरत शेर के लिए

Dr.R.Ramkumar said...

geeton ko zinda rakhane ka shukriya

संजय भास्कर said...

AATI SUNDER

Devi Nangrani said...

मेरी तन्हाई ने हर रोज़ ये पूछा 'शाहिद'

कैसे कटते हैं तेरे शाम-ओ-सहर परदेसी

bahut khoob. soch ko shabdon ka libaas!!