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Tuesday, January 26, 2010

अपने वतन में


साहेबान, आप सभी को
गणतंत्र दिवस के पावन पर्व की  
हार्दिक शुभकामनाएं




 बुलंदी के आकाश पर जाके छाए 
ये 'सोने की चिड़िया' मधुर गीत गाए

 पंकज सुबीर जी के ब्लाग पर तरही मुशायरे में कहे गये इस शेर से आग़ाज़ करते हैं. संयोग देखिये कि पोस्ट करने से कुछ समय पहले ज्योति सिंह   जी का मेल आया, जिसमें भेजी गयी तस्वीर इस शेर के लिये मुनासिब लगी (शुक्रिया ज्योति जी)

(श्रद्देय महावीर शर्मा जी ने भी अपने ब्लाग मंथन पर एक रचना को स्थान देकर नाचीज़ की हौसला अफ़ज़ाई की है) 


बस एक बात और कहना चाहता हूं
इससे पहली पोस्ट
यादों की किरन को लेकर
आप सभी साहेबान ने जो प्यार मिला, मेरे लिये अनमोल रहा.
शुक्रगुज़ार हूं आप सबका.


आईये जश्न के माहौल में चलें-
सबसे पहले एक क़ता हाज़िर है















संस्कारों में बंधे रहते हैं भारतवासी

प्यार की जमुना तो जज्बात की गंगा लेकर

राष्ट्रभक्ति ही मज़हब होता है उन लम्हों में

जब निकल पड़ते हैं हाथों में तिरंगा लेकर
*********************************

लीजिये हाज़िर है ग़ज़ल
अपने वतन में

हर रुख से चली यूं तो हवा अपने वतन में
सावन कभी पतझड़ न बना अपने वतन में

साज़िश तो बहुत रचते रहे अम्न के दुश्मन...
रिश्तों पे रही महरे-खुदा अपने वतन में

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में
                  शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

35 comments:

महफूज़ अली said...

बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....

इस्मत ज़ैदी said...

shahid sahab,
तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में
hasile ghazal hai ye sher ,behad khoobsoorat ,waise to koi sher kam nahin kaha ja sata lekin is sher ne aik nai rooh phoonk dee hai kalam men'khuda apke is jazbai hubbulwatani ko hamesha qayem rakhe. matla bhi bahut achchha hai.

kshama said...

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में..
kya khoob kaha hai!
Gantantr diwas kee dheron shukamnayen..meree tootee madhaiyya me mera raaj rahe, koyi gair na dast andaaz rahe!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

साज़िश तो बहुत रचते रहे अम्न के दुश्मन...
रिश्तों पे रही महरे-खुदा अपने वतन में
बहुत खूब शाहिद साहब. खूब तस्वीर भी लगाई है. गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें.

Udan Tashtari said...

शानदार...अब महावीर जी के ब्लॉग पर देखते हैं.

गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

शहरोज़ said...

क्या कहना है जनाब!! तबियत खुश हो गयी यहाँ आकर!!

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में..

Devendra said...

बेहतरीन गजल.
गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ.

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में
..वाह!

shikha varshney said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में
क्या बात है शहीद साहेब जज्वात और राष्ट्र प्रेम से लबालब पोस्ट..बहुत ख़ुशी हुई पढ़कर..फक्र भी

Babli said...

बहुत सुन्दर! आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

सुलभ 'सतरंगी' said...

वतनपरस्ती का जज्बा शब्दों में ढल कर निकला है आज. बहुत सुन्दर रचना. आपके जज़्बात सर आँखों पर.

सर्वत एम० said...

बहुत ही कामयाब और मौके की गजल. मुझे तो पूरे गजल ही 'दुआइया' लगी. काश, जितनी भी खस्लतें आप ने बयान की हैं, सभी हमारे देश में पैदा हो जाएं तो इसे दुबारा सोने की चिड़िया बनने से कोई रोक नहीं सकेगा.
मेरी तारीफ़ है, इसे अदरवाइज़ न लीजिएगा. गणतन्त्र दिवस पर इससे बेहतर तोहफा दूसरा हो भी नहीं सकता. मुबारकबाद.

श्रद्धा जैन said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

वाह शाहिद जी क्या कमाल के शेर कहे हैं आपने
मज़ा आ गया
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

हास्यफुहार said...

अच्छी पोस्ट!

निर्मला कपिला said...

Shahid jee apki gazal par mera kuch kahana munasib nahin soraj ko deep kaise dikhaoon bas salam hai apaki kalam ko | shubhkamanayen subha manthan par dekhi thi apake gazal laajavab

महावीर said...

गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
राष्ट्रभक्ति ही मज़हब होता है उन लम्हों में
जब निकल पड़ते हैं हाथों में तिरंगा लेकर
बहुत सुन्दर!
'अपने वतन में' एक निहायत आला दर्जे की ग़ज़ल है. हर शे'र जैसे बोल रहा हो.
साज़िश तो बहुत रचते रहे अम्न के दुश्मन...
रिश्तों पे रही महरे-खुदा अपने वतन में
तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में
बधाई.

ज्योति सिंह said...

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में
bahut hi shaandaar ,mere man ki aawaz aapke labjo me ubhar aai ,ise hi kahte hai mile sur mera tumahara to sur bane hamara ,
insaaniyat se upar nahi koi dharm hamara ,vande maatram ,hai ye jameem hamaari ,hai aasma hamara .......saare jahan se achchha hindostaan hamara .

Devi Nangrani said...

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

Waah vatan ki shaan mein ek aur pankh

Suman said...

nice

दिगम्बर नासवा said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में.

शाहिद साहब ........... बस इतना कहूँगा ........

हमें तो लूट लिया आपकी इन ग़ज़लों नें ............ कमाल का लिखते हैं आप ....... और आपका जज़्बा क़ाबिले तारीफ़ है ...... देश के हर दिल में अगर यही जज़्बा हो तो कोई देश का बॉल बांका भी नही कर सकता ..........

psingh said...

शाहिद साहब
जोरदार रचना पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन
बहुत बहुत बधाई

MUFLIS said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

हुज़ूर ....
बहुत ही मा`नाखेज़ शेर कहा है आपने
इस तरह की बातों के ज़िक्र से
एक मुसबत ख़याल
ज़ेहन में अंगड़ाईयाँ लेने लगता है....
अच्छा लगता है
और....
मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में

मक़ता अपने आप में मुकम्मिल है ,,,
इत्तेफ़ाक़ करने को दिल भी करता है.....

ग़ज़ल की बुनावट और लहजा
चुस्त है,,कामयाब है .....
अपने आप मन में उतरती है....

मुबारकबाद

गौतम राजरिशी said...

लाजवाब ग़ज़ल है सर\

मक्ते पे लाखों दाद कबूल फरमायें हुजूर और ये शेर तो उफ़्फ़्फ़:-

"तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में"

बहुत खूब!

'अदा' said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

सलाम,
वल्लाह !!
क्या मिजाज़ है इन शेरों के ..
हम तो बस तारीफ के लिए अलफ़ाज़ ढूंढ़ते फिर रहे हैं...
बेशकीमती है सबकुछ....

नीरज गोस्वामी said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

तहज़ीब का हिस्सा है यहां सादा मिज़ाजी
जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

सुभान अल्लाह शाहिद साहब क्या गज़ब के शेर कहें हैं आपने इस खूबसूरत ग़ज़ल में...दिल बाग़ बाग़ हो गया...दर असल मैं जयपुर अपने घर गया हुआ था कल ही लौटा हूँ, इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देर हुई... माफ़ कीजियेगा. इस खूबसूरत कलाम के लिए दिली दाद कबूल करें.
नीरज

तिलक राज कपूर said...

क्‍या बात है शाहिद भाई। बहुत बहुत बधाई उम्‍दा अशआर से भरी इस ग़ज़ल के लिये।
आपने इस वतन की तहजीब के मोती पिरोये हैं वो काबिल-ए-तारीफ़ है।

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत खूबसूरत भाव....हिन्दुस्तान की जय....सुंदर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

सतीश सक्सेना said...

प्यार की अच्छी खनक है आपके दिल में ...शुभकामनायें !

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....

अमिताभ श्रीवास्तव said...

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी
हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में
lazavaab he ji. qataa aour gazal..janaab..dono ek misaal pesh karte hue.

kumar zahid said...

HAR SHER LAZAWAB HAR BAT PUR ASAR..
AAJ APKI TAMAM RACHNAYEIN PADHI AUR LAGA KI DER KYONK ?

psingh said...

शाहिद साहब
बेहतर रचना का नायब शेर
साज़िश तो बहुत रचते रहे अम्न के दुश्मन...
रिश्तों पे रही महरे-खुदा अपने वतन में
धन्यवाद ................

kshama said...

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में
Kya baat hai..! Har pankti aakhon me khushee kee namee latee rahee..

ram ray said...

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Mrs. Asha Joglekar said...

मिटती नहीं मिट्टी से ये उल्फ़त कभी शाहिद
होने को तो क्या कुछ न हुआ अपने वतन में ।
बहोत खूब साहिद साहब, जोरदार गज़ल ।

Maria Mcclain said...

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