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Sunday, February 28, 2010

धनवान हो न हो

 रंगोत्सव होली की हार्दिक शुभकामनाएं















ये रंग विश्वास के हमेशा बरसते जाएं मेरे वतन में
रिफ़ाक़तों की यें गंगा-जमनासूख पाएं मेरे वतन में
 

*********************

खिल उठें दिल सभी उल्फ़त की महक से शाहिद
 लेके हाथों में अबीर अम्न का टोली आए 

बरसे हर सम्त फ़िज़ाओं में मुहब्बत का गुलाल
 रंग खुशियों के ही बरसाए जो होली आए

 

*******************

वफ़ा मुहब्बत ख़ुलूस जिनमें हैं रंग सारे तेरी गली में 
मेरे भी कूचे में फूल महकें तो खुशबू जाये तेरी गली में
मैं भाईचारे के गीत लिखूं तू अपनी आवाज़ से सजा दे
हों मेरे लब पर तेरी सदाएं, मेरे तराने तेरी गली में
 


********************
(यहां भी देखें)

 ********************


 हज़रात आदाब
गांधी जयंती, 2 अक्टूबर 2009
यानी सिर्फ़ साढ़े चार महीने पहले
’मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंजिल...’
और शुरू किया गया ये ब्लॉग जज़्बात
इतने कम वक़्त में नाचीज़ के पास आप सबकी दुआओं का नायाब सरमाया है
’ये आपकी मुहब्बत इनायत करम... हौसला अफ़ज़ाई और ज़र्रानवाज़ी है
बस इसे कायम रखने की गुज़ारिश है... 
( ईद-ए-मिलाद-उल-नबी  के मौक़े पर एक नात पाक  
serat-e- mustaqeem 

पर पोस्ट की गई है.

एक ग़ज़ल आखर कलश पर भी प्रकाशित की गई है)



पेश है एक सादा सी ग़ज़ल

मुश्किल कभी हयात की आसान हो न हो
लिखा जो है वो होगा परेशान हो न हो

मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

जो ओहदेदार है उसे जाकर सलाम कर
तेरी नज़र में क़िबला श्रीमान हो न हो

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

60 comments:

निर्मला कपिला said...

शाहिद जी पूरी गज़ल ही बहुत अच्छी लगी मेरे कमेन्ट कुछ मायने नही रखते मुझे अभी गज़ल की पूरी समझ भी नही है मगर आप जैसे फन के उस्ताद लोगों को पढ कर ही सीख रही हूँ हर एक शेर लाजवाब है बधाई और शुभकामनायें

sangeeta swarup said...

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

खूबसूरत ग़ज़ल.....बधाई

दिगम्बर नासवा said...

लंबे समय बाद आपने कुछ लिखा है ... मुकम्मल लिखा है ... मुश्किल काफियों को आसानी से कह दिया है ...

मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो
बहुत लाजवाब शेर है ये ... शाहिद जी .. आज के दौर में अक्सर डर भी लगता है कहीं उल्टा न पढ़ जाए ...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो
ये भी सच है ... जो उसके दर पर जाता है वो खाली हाथ नही लौटता ... धनवान की परिभाषा तो सबकी अपनी अपनी है ..

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो
वाह शाहिद जी .... सच है जिसने जिंदगी को दोस्ती का प्रयाय समझ लिया ही फिर उसको दुश्मनी की पहचान न भी तो क्या फ़र्क पड़ता है ..

रचना दीक्षित said...

बहुत खूब कहा है, हर शेर अपने आप में बेमिसाल है. फिर भी मेरी पसंद

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

इस्मत ज़ैदी said...

मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो

shaahid saahab ,bahut khoob
jab log apnaa aaram o chain chhod kar doosron kee takleef ke baare men sochne lagenge to duniyaa kitnee khoobsoorat hogee .
umdaa ghazal ke liye mubaarakbaad qubool farmaaen.

नीरज गोस्वामी said...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो

माशा अल्लाह...बेहतरीन ग़ज़ल कही है अपने...हर शेर मुकम्मल है. दाद कबूल फरमाएं.
नीरज

mukti said...

वाह हमेशा की तरह प्यारी सी ग़ज़ल...मेरी पसंदीदा लाइनें हैं-
मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो

shama said...

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो..
kya baat kahee hai! Aapki gazal kisee bhi tippaneekee mohtaj nahee...

shikha varshney said...

शाहिद साहेब ! बहुत खुबसूरत एहसासों के साथ बुनी है आपने ग़ज़ल ..बहुत पसंद आई ..खासकर ये शेर
मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो

अमिताभ श्रीवास्तव said...

shaid sahab, aapki nazmo ka intjaar rahtaa he.
मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो
bahut khoob she'r he saahb yeh. ise mene note kar liya he..

अल्पना वर्मा said...

'मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो'

वाह! वाह! वाह!
क्या खूब कहा है!
बेहद खूबसूरत शेर!

'शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो'
-वाह!बहुत उम्दा!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

"मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो"
इतना खूबसूरत शेर है, कि घूम-फिर के इसी शेर पर अटक जाती हूं. वैसे तो पूरी ग़ज़ल ही खूबसूरत है, लेकिन इस शेर के तो क्या कहने.बधाई.

MUFLIS said...

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

बहुत ही अच्छा और मेआरी शेर
कह दिया आपने हुज़ूर
हालांकि दोस्तों की बेरुखी पर काफी कुछ
कह दिया गया है लेकिन जब अंदाज़ अलग हो
और बात सलीक़े से कही गयी हो तो
शेर में नयी जान आ जाया करती है ...वाह
और
शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो
सच कहा आपने
जब उस की छाँव मिल जाए तो
कोई भी धुप. तपन. चुभन क्या जला पाएगी भला

पूरी ग़ज़ल बड़ी सादगी से
लेकिन संजीदगी से कही गयी है
मुबारकबाद

Suman said...

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो.nice

श्रद्धा जैन said...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो

आहा क्या बात कह दी है
कमाल बहुत नायाब शेर है


सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

ग़ज़ल बहुत खूबसूरत लगी
खास कर ये शेर

बेचैन आत्मा said...

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो
...वाह! क्या उम्दा शेर है!

संजय भास्कर said...

खूबसूरत ग़ज़ल.....बधाई

महफूज़ अली said...

खूबसूरत ग़ज़ल.....बधाई.....

manu said...

शुक्रिया जनाब...
नाचीज़ को याद रखने के लिए..
ग़ज़ल तो खुद अपनी तारीफ़ कर रही है ..हम क्या करें...?
कर भी क्या सादगी से रही है...

RaniVishal said...

आदरणीय,
बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है! हर एक शेर पर वाह वाह करने को जी चाहता है ....मुझे ग़ज़ल की बरिकोयों का ज्ञान नहीं लेकिन ग़ज़ल का शोक बहुत है! आपका स्नेह बना रहे बस यही दुआ कराती हूँ !
शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो
क्या बात है ...बहुत बहुत आभार !!

kumar zahid said...

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो


यूं तो हर ग़ज़ल लाजवाब, हर शेर आला है .. इस गज़ल का यह शेर बेहद असरदार मुझे लगा..

ज्योति सिंह said...

मुश्किल कभी हयात की आसान हो न हो
लिखा जो है वो होगा परेशान हो न हो

मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

जो ओहदेदार है उसे जाकर सलाम कर
तेरी नज़र में क़िबला श्रीमान हो न हो

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो
poori gazal shaandar kise kahoon khas

वाणी गीत said...

सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो....
क्या बात है ...

Raviratlami said...

वाह! वाह!! कमाल की ग़ज़ल है. ये पंक्ति तो वाकई मारक है -


जो ओहदेदार है उसे जाकर सलाम कर
तेरी नज़र में क़िबला श्रीमान हो न हो

पर, इन पंक्तियों को जेनुइनली सलाम!

psingh said...

शहिद साहब
सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो
बहुर सुन्दर हर मिसरा उम्दा
आभार

singhsdm said...

शाहिद भाई......
मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो
अच्छे शेर निकले हैं हुज़ूर........सुभानल्लाह.......!

Anonymous said...

Great shaihid ji....

salute .....

sunil gajjani said...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो
janab shahid ji ki nazar me aap ka hi ye sher arj kar aadab karta hoo. puri gazal sunder hai , magar meri pasad ka ye sher hai. khoobsurat gazal ke liye , shukariya

अखिलेश शुक्ल said...

आज आपके ब्लाग पर जाकर ग़ज़ल पढ़ी इस बेहतरीन रचना के लिए मेरी ओर से बधाई। इन ग़ज़लां को प्रकशन के लिए अवश्य ही भेजंे। साहित्यिक पत्रिककाओं के पते व संक्ष्क्षिपत समीक्षा के लिए मेरे ब्लाग पर पधारें।
अखिलेश शुक्ल
http://katha-chakra.blogspot.com

श्याम कोरी 'उदय' said...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो
...बहुत खूब, प्रसंशनीय !!!

शेरघाटी said...

bahut khoob,
kya andaaz hai janab!!

shahroz

सुलभ § सतरंगी said...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो
Waah!
मिर्ज़ा साहब ये ग़ज़ल भी खूब रही, आपके बेहतरीन कलामों में से एक.

तिलक राज कपूर said...

उम्‍दा अशआर से भरी ग़ज़ल।

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो।

की बात समझ में आ जाये तो दुनिया वालों गला, शिकवा या शिकायत का कारण ही नहीं रह जाता है।

सुधीर said...

Mirza ji bhut khoob
vah!

Akanksha~आकांक्षा said...

बेहतरीन ग़ज़ल...मुबारकवाद.

पद्म सिंह said...

आप तो पहले ही मेरे दिल के बहुत करीब हैं ...
मुरीद हो गया हूँ आपका ..
बेहतरीन गज़ल ... बेशकीमती शे'र

संजय भास्कर said...

बेहतरीन ग़ज़ल...मुबारकवाद.

सर्वत एम० said...

मैं कौन सा शेर कोट करूं और किसे छोड़ दूं, बेहद मुश्किल मरहला है. मैं इस गजल के एक-एक शेर को अभी तक जहन में बसाए हुए हूँ. ३ दिन पेश्तर कमेन्ट भी पोस्ट करने की कोशिश की थी जो सिस्टम के हवाले हो गया.
आपकी मुहब्बत और बेलौस दोस्ती को नज़रंदाज़ करना कुफ्र होगा. लेकिन मुझे अभी थोडा वक्त दीजिए ताकि कुछ दूसरे कामों से निजात हासिल कर लूं. साहित्य हिन्दुस्तानी पर अलका जी ने जो काम कर दिया है, कमेंट्स देखे मैं ने. फुर्सत होली के बाद ही मिल सकेगी. अभी बहुत सी मुहब्बतों का कर्ज़ बाकी है, उन्हें चुका लूँ, फिर किसी नई पोस्ट की तरफ ध्यान दूंगा. उम्मीद है आप मेरी मजबूरियों के मद्देनजर अभी, फौरी तौर पर मुआफी तो देंगे ही.

kshama said...

शाहिद मुहाफ़िज़ों के मुहाफ़िज़ पे रख नज़र
दुनिया में तेरा कोई निगेहबान हो न हो
Wah!
Holi kee aapko bhee dher saaree shubhkamnayen!

दिगम्बर नासवा said...

आपको और आपके समस्त परिवार को होली की बहुत बहुत शुभ-कामनाएँ ......

सतीश सक्सेना said...

होली और मिलाद उन नबी की शुभकामनायें !!

शहरोज़ said...

aap bhai sahab khoob taba-aazmaai kar rahe hain aur beshak kaamyaab hai,
mauqa mile to rachna-sansaar aur saajhaa-sarokaar ki nayi post padhen.

दीपक 'मशाल' said...

इस बार रंग लगाना तो.. ऐसा रंग लगाना.. के ताउम्र ना छूटे..
ना हिन्दू पहिचाना जाये ना मुसलमाँ.. ऐसा रंग लगाना..
लहू का रंग तो अन्दर ही रह जाता है.. जब तक पहचाना जाये सड़कों पे बह जाता है..
कोई बाहर का पक्का रंग लगाना..
के बस इंसां पहचाना जाये.. ना हिन्दू पहचाना जाये..
ना मुसलमाँ पहचाना जाये.. बस इंसां पहचाना जाये..
इस बार.. ऐसा रंग लगाना...
(और आज पहली बार ब्लॉग पर बुला रहा हूँ.. शायद आपकी भी टांग खींची हो मैंने होली में..)

होली की उतनी शुभ कामनाएं जितनी मैंने और आपने मिलके भी ना बांटी हों...

इस्मत ज़ैदी said...

शाहिद साहब,
खुदा से यही दुआ है कि आप की ये दुआ ज़रूर पूरी हो ,आमीन

फ़िरदौस ख़ान said...

मुश्किल कभी हयात की आसान हो न हो
लिखा जो है वो होगा परेशान हो न हो

बहुत ख़ूब...बहुत अच्छा लगता है आपके ब्लॉग पर आकर...

नीरज गोस्वामी said...

आपको होली की मुबारक बाद देने फिर से आ गया हूँ...और हाँ इस खूबसूरत शेर :-
मत बन पड़ोसियों की भी तकलीफ़ का सबब
राहत सुकूं क़रार का सामान हो न हो

के लिए दिली दाद कबूल फरमाएं.
नीरज

अनामिका की सदाये...... said...

मायूस जिस के दर से सवाली नहीं गया
बरकत ज़रूर होगी वो धनवान हो न हो


bahut acchhi gazel..badhayi.aur holi ki shubhkamnaye.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें.

निर्मला कपिला said...

ांअपको ईद व होली की हार्दिक शुभकामनायें गज़ल पढ चिकी हूँ सब से पहले। धन्यवाद्

Babli said...

आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

अल्पना वर्मा said...

'ये रंग विश्वास के हमेशा बरसते जाएं मेरे वतन में
रिफ़ाक़तों की यें गंगा-जमना न सूख पाएं मेरे वतन में '
'Aameen!'

'होली की हार्दिक शुभकामनायें'

सतीश सक्सेना said...

आपको सपरिवार शुभकामनायें !

प्रकाश पाखी said...

शाहिद साहब,
बहुत ही बेहतरीन लिखते है...मुझे इस बात का अफ़सोस हो रहा है कि आपका ब्लॉग इतने दिन मेरे हाथ क्यों नहीं आया.खैर नुक्सान तो मेरा ही हुआ.अब आपको लिस्ट में ले लिया है.
जब पूरी गजल संजीदा और खूबसूरत हो तो कहने को कुछ नहीं रहता.एक एक शेर बहुत सुन्दर है..आपकी पिछली गजलें भी पढ़ी बेहद खूबसूरत लगी आपका आभार
और होली की शुभ कानाएं!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

जनाब शाहिद साहब,
होली की मुबारकबाद।
'जो ओहदेदार है उसे जाकर सलाम कर
तेरी नज़र में क़िबला श्रीमान हो न हो'
वाह, इस दौर के इन हालात पर जब भी कुछ पढ्ता हूं पता नहीं क्यो अच्छा लगता है। लगता है दिल के अन्दर दबी सी बात आपके कलाम से होकर गुजर रही है। बहुत खूब।
साथ ही कहना चाहूंगा कि आपका मैरे ब्लोग पर तशरीफ लाना सुकून दे जाता है, अपने लिखे को मानो सांसे मिल जाती है। अगर मेरा कोई मज़मुआ आपके जैसे फनकार का प्यार पा जाता है तो उसकी निगहत से मैं बाग बाग हो उठता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं अपनी जाती मसरूफियात से फुर्सत निकालना और किसी के कलाम को इमानदारी से पढना आजकल कठिन हो गया है, बावज़ूद आप तशरीफ लाते हैं, मुझे नवाज़ते हैं..सच पूछिये...दिल से अच्छा लगता है। शुक्रिया. बहुत बहुत शुक्रिया। यह प्यार, अशआरों से यह मोहब्बत उम्रभर बनी रहे। आमीन।
आपका
अमिताभ

ज्योति सिंह said...

shahid ji aapko holi ki mubaarakbaad chutki bhar abir ke saath ,

pukhraaj said...

अति सुन्दर ..
इस ग़ज़ल पर यही कहने को जी चाहता है ....
हर शेर उम्दा ...कुछ आपने कहा कुछ
दिगंबर नसवा जी ने ...अब कुछ कहने को बाकी नहीं रहा ...

JHAROKHA said...

bahut hi khubsurat bhavnavon ke sath likhhi gayi gajal dil ko chho gayi.
poonam

manu said...

मैं भाईचारे के गीत लिखूं तू अपनी आवाज़ से सजा दे
हों मेरे लब पर तेरी सदाएं, मेरे तराने तेरी गली में ...

होली की इस दुआ को बड़े दिल से पढ़ रहे हैं..

सुमन'मीत' said...

वफ़ा मुहब्बत ख़ुलूस जिनमें हैं रंग सारे तेरी गली में
मेरे भी कूचे में फूल महकें तो खुशबू जाये तेरी गली में
बहुत बेहतरीन पंक्तियां
शुभकामनाओं सहित
सुमन कपूर ‘मीत’

गौतम राजरिशी said...

एक अंतराल के बाद लौट रहा हूँ जज़्बात के पन्नों पर।

बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है सर जी खास कर मक्ते ने तो कहर ढ़ा दिया है। लेकिन ये वाला शेर तो याद कर लिया है मौके-बेमौके बोलने के लिये:-
"जो ओहदेदार है उसे जाकर सलाम कर
तेरी नज़र में क़िबला श्रीमान हो न हो"