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Sunday, November 15, 2009

ताजमहल पर एक कताअ और

मेरे ब्लाग पर आने और अपनी बेशकीमती राय जाहिर करने वाले सभी
साहेबान का न सिर्फ शुक्रगुजार हूं, बल्कि कर्जदार भी हूं.

मुझे लगता है अब मेरी जिम्मेदारी और बढ गई है.
कोशिश रहेगी आपकी उम्मीदों पर खरा उतरता रहूं..
आप हजरात ने ये कताअ काफी पसंद किया-

तेरे जलवों की ज़िया है या मेरा ज़ोके-सुखन
बेपनाह हुस्न मुकम्मल सी गज़ल दिखता है.
मेरी नज़रों से कोई देखे तुझे तो जाने,
तेरे हर अक्स में इक ताजमहल दिखता है...
चलिये ताजमहल पर एक कताअ और हाज़िर करता हूं मुलाहिज़ा फरमायें-
रंगीं, मेरी हयात की, तस्वीर कर गया

महके हुए गुलाब सी तकदीर कर गया

दिल की ज़मीं पे ताजमहल अपनी याद का

इक शख्स कितने प्यार से तामीर कर गया

शाहिद मिर्ज़ा 'शाहिद'

5 comments:

jaan said...

waah janab bohot hi umdah
hame bohot pasand aaya aapke bohot se to nahi par kam hi ashaar padhe hain mane par ab dil karta hai har ashar pe nazar dale....aur hamari dua hai apk liye k apka kalam aise hi chalta rahe Aameen
aur apse ek guzarish bhi hai k hosake to aap tauheed par kuch likhe......Jazakallah khair

shikha varshney said...

wah wah bahut hi khubsurat kaha hai aapne..mashaallah..

महावीर said...

जनाब शाहिद साहब
आपके खूबसूरत क़ताआत पढ़े और दाद किये बग़ैर न रह सका. हर लफ्ज़ दिल को छूता हुआ लगा. दाद क़ुबूल फ़रमाईये.
आपने मेरे ब्लॉग पर जिस अंदाज़ में मेरी ग़ज़ल की पज़ीराई की है उस के लिए दिली शुक्रिया.
महावीर शर्मा

अल्पना वर्मा said...

Kya baat hai!!

रंगीं, मेरी हयात की, तस्वीर कर गया

महके हुए गुलाब सी तकदीर कर गया

दिल की ज़मीं पे ताजमहल अपनी याद का

इक शख्स कितने प्यार से तामीर कर गया

bahut hi badhiya !kamaal ka likhte hain aap!

इस्मत ज़ैदी said...

दिल की ज़मीं.............
इक शख़्स ..............

खूबसूरत जज़्बात की बाकमाल अक्कासी