एक पुरानी ग़ज़ल ख़िदमत में हाज़िर है
ये ग़ज़ल खुद मुझे बहुत पसंद है....
उम्मीद है आप भी पसंद फ़रमाएंगे
मुलाहिज़ा फ़रमाएं.....
ये दर्स भी हुआ हमें हासिल कभी कभी
आसान ख़ुद ही होती है मुश्किल कभी कभी
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
इस खौफ से मैं बज्म में हंसने से डर गया
रोयेगा खिल्वतों में मेरा दिल कभी कभी
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
शाहिद मिर्जा शाहिद
49 comments:
shaahid bhaayi bhut khub aek ummid men kshti ko dubne se bhaa li isi ko himmt khte he . akhtar khan akela kota rajsthan
बहुत खूब लिखते हैं गज़ल आप यूँ तो
हमें पढ़ने को मिलता है मगर कभी कभी :)
माशाल्लाह बहुत खूबसूरत गज़ल है शहीद जी
'कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी'
वाह!बहुत खूब कहा है,उम्मीद की एक छोटी सी किरण भी मंजिल तक पहुँचा देती है,बस मंजिल को नज़र से ओझल नहीं होने देना चाहिए.
-बहुत अच्छी ग़ज़ल है.
bahut khoob...shaandar...
aapki ghazlo ka besabri se intezaar rahta h..
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
बहुत ख़ूब!
ग़ज़ल के तक़ाज़ों को पूरा करता हुआ बेहद ख़ूबसूरत शेर
इस खौफ से मैं बज्म में हंसने से डर गया
रोयेगा खिल्वतों में मेरा दिल कभी कभी
वाह!
कुछ अश’आर ऐसे होते हैं जिन्हें हम जितनी अच्छी तरह महसूस कर सकते हैं उतनी अच्छी तरह मुनासिब अल्फ़ाज़ में उस की तारीफ़ नहीं कर सकते
ये शेर कुछ ऐसा ही है
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिये मुबारकबाद क़ुबूल करें
ये दर्स भी हुआ हमें हासिल कभी कभी
आसान ख़ुद ही होती है मुश्किल कभी कभी
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
Wah! Maza aa gaya.....aapne poore ek maah ke baad ye post daali hai..gazab ke alfaaz hain!
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
बहुत सुन्दर ...
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
क्या बात है...बहुत ही उम्दा ग़ज़ल
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया......यह उम्मीद कभी बेअसर नहीं होती
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
शाहिद भाई ,
पुराने चांवल ही पककर लज़ीज़ होते हैं ।
अर्ज किया है..
क्या जानिये क्या याद में होता है करिश्मा
छूटी हुई मिल जाती है महफिल कभी कभी
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
कहीं तो उम्मीद की किरण नज़र आई.
हमेशा की तरह सुंदर उम्दा गज़ल.
शाहिद भाई
क्या खूब ग़ज़ल कही है....सच में मज़ा आ गया.
ये दर्स भी हुआ हमें हासिल कभी कभी
आसान ख़ुद ही होती है मुश्किल कभी कभी
दर्स लफ्ज़ अरसे बाद पढने को मिला...इसका इस्तेमाल बखूबी किया है....सुभानाल्लाह !
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
वाह....इस शेर पर दाद दिए बिना कैसे रहा जा सकता है....!
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
उस्तादों की शायरी की झलक है इस शेर में......!
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
बहुत सुन्दर शेर.
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
क्या कहूं? इतने सुन्दर अश’आर कि शब्द खोज रही हूं, लेकिन मिल ही नहीं रहे....वैसे भी सुन्दर शेर पर मैं केवल "वाह" कह पाती हूं, चाह कर भी तमाम शब्द जुटा नहीं पाती.... इतनी सुन्दर गज़ल के लिये बधाई.
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
vandana ji ki baton se main bhi sahamat ,is khoobsurat gazal pe waah waah ke siva aur kahoon kya ?wakai kamaal ki hai har baat .
बेहतरीन गजल .....................
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
Kya gazab dhaya hai is pooree gazal ne...sach alfaaz nahee mil rahe ki kuchh likhun!
मन को छू गयी।
Shahid bhai..
Namaskar!
Es baar bahut din baad aaye..
"SHAHID" ko tarasti rahin, aankhen meri kabse..
Tum bin sunaye kaun hamen,
Gazal kabhi kabhi..
Behtareen gazal..
Deepak..
हर शेर मुकम्मल एहसास जी रहा है।
कोई ग़ज़ल कहे जो मुकम्मल तो देखिये
आती है दाद देने में मुश्किल कभी कभी।
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
शाहिद भाई आपकी मन पसंद ग़ज़ल अब आपकी ही मन पसंद नहीं रही हमारी भी हो गयी है...बेहतरीन अशआरों से सजी ये ग़ज़ल भला किसी मन पसंद नहीं होगी...दिली दाद कबूल करें...
नीरज
लजवाब!
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
इस खौफ से मैं बज्म में हंसने से डर गया
रोयेगा खिल्वतों में मेरा दिल कभी कभी
शाहिद भई कई बार कुछ कहने से बेहतर लगता है की उसको सिर्फ महसूस किया जाए और उम्मीद तो दामन कभी छोडती नहीं. सो मैं महसूस कर रही हूँ
आप की रचना 30 जुलाई, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
http://charchamanch.blogspot.com
आभार
अनामिका
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
yun to her sher laajwaab hai,
per ye mujhe bahut pasand aaya...
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
आदाब !
मेरी पसंद का शेर आप कि नज़र किया है .
हर शेर अच्छा है , एक मुद्दत के बाद आप का कलाम मिला , शुक्रिया
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
शाहिद भाई आप तो कमाल के गज़लकार हैं आपकी तारीफ में और क्या कहें एक एक शेर नायाब ।
सुन्दर , उम्दा ग़ज़ल , बधाई
बहुत खूबसूरती से आपने हर एक शब्द लिखा है! आपकी लेखनी को सलाम! लाजवाब ग़ज़ल ! इस उम्दा पोस्ट के लिए बधाई!
Shahid bhai
is ghazal par sabhi ne itni tippadiyan likh di hain ki alag se kahane ko kuchh raha hi nahin. fir bhi is achhi aur mukammal ghazal ke liye badhai.
Chandrabhan Bhardwaj
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
कई बार छूट गई मंजिले आवाज देती हैं.....
पर आपकी कब्र पर कातिल आ तो जाता है..अपनी पर कब्र को नींव समझ कर वो उस पर मकान बना बैठा है.....
क्या बात है आप मेरे ब्लॉग का रास्ता भूल गए हैं क्या...
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
बहुत ख़ूब...
हमेशा की तरह ही शानदार ग़ज़ल...
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
bahut hi badhiya Sher!
शानदार ग़ज़ल मिर्ज़ा साहिब..
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
बहुत प्यारा शे'र है...अपने दिल के करीब है..
और...
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
और वैसा ही मक्ता भी है...
एकदम अपने को ही छूता हुआ सा
Wah-2 har sher apne aap me adbhut
kis-2 ki tafif ki jaye...samjh me nahi ata par itna kahunga ....bhut khoob.
www.ravirajbhar.blogspot.com
मित्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ!
शाहिद जी ,
हर बार की तरह .....नहीं उससे भी कहीं बेहतर .....हर इक शे'र ......
और ये दो शे'र तो लिए जा रही हूँ ......
इस खौफ से मैं बज्म में हंसने से डर गया
रोयेगा खिल्वतों में मेरा दिल कभी कभी
ओये होए ......!!
ये तन्हाई का आलम और उस पर आप का गम ......??
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
सुभानाल्लाह ......!!
कोई रकीब रहा होगा .....कमबख्त ....!!
जब किसी गज़ल के सभी अशआर लाज़वाब होते हैं तभी उस गज़ल को उम्दा गज़ल कहते हैं. यह बात तब याद आई जब मैं देर तक एक बेहतरीन अशआर ढूंढता रहा और नहीं ढूंढ सका.
...उम्दा गज़ल.
...बधाई.
shahid sahb
har sher me dam hai
umda gajal har bar ki tarah
badhaiiiiii
आपने तो मुश्किल तरीन जमीनों, काफियों, रदीफ़ों को उठा लेने की कसम खा रखी है. हम जैसे तो पोस्ट पढ़ने के बाद सकते में आ जाते हैं. बजाए तारीफ, हसद हावी हो जाता है. अहमद नदीम कासिमी ने कहा था-- "अपनी कोताही-ए-फन याद आई", बस यही मिसरा जहन के सन्नाटों में गूंजता रह जाता है.
अच्छे कलाम की तारीफ़ भी शायद एक फ़न है और शायद इन दिनों फ़न मुझसे रूठा हुआ है.
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
waah waah ke saath..aah!! bhi nikli......bahut khoob!
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
bahut apna sa lagta hai ye sher
aapko padhna bahut sukhad raha
बड़े दिनों से आपकी ये गज़ल बुकमार्क करके रखी थी, आज आपकी टिप्पणी पढ़ी अपनी पोस्ट पर तो ध्यान आया. मैं यहाँ बेचैन जी की बात से सहमत हूँ. यह गज़ल पूरी ही बहुत उम्दा है. पर फिर भी एक शेर जो मुझे सबसे अधिक पसंद आया--
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! आपके नए पोस्ट का इंतज़ार है!
आपकी टिपण्णी के लिए आपका आभार ...अच्छी कविता हैं...बहुत अच्छी .
इस खौफ से मैं बज्म में हंसने से डर गया
रोयेगा खिल्वतों में मेरा दिल कभी कभी
kya baat hai shahid sahab !!
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी
राह-ए-जनून-ऐ-शौक में पीछे जो रह गई
मुझको पुकारती है वो मंजिल कभी कभी
शाहिद ये राज क्या है कि मेरे मजार पर
आता है अश्कबार वो कातिल कभी कभी
वाह किसे छोडूँ किसे कोट करूँ हर एक शेर लाजवाब है। बधाई ।
शाहिद जी, आज का दिन बहुत ख़ास है. ये अब बताने कि जरुरत नहीं, तरही में देख रहा हूँ.
मन बाग़ बाग़ हुआ, और इस ग़ज़ल के क्या कहने.
(इन दिनों ब्लॉग पर नियमित नहीं हूँ, फिर भी मौका निकालकर आता रहता हूँ, आता रहूंगा)
कश्ती को इक उमीद ने आकर बचा लिया
आता रहा नज़र मुझे साहिल कभी कभी ..
बहुतर खूब शाहिद साहब .... खूबसूरत शेरों का गुलिस्ताँ है ये ग़ज़ल ..... जीने की उम्मीद मिलती रहे तो क्या बात है फिर ....
बहुत उम्दा ग़ज़ल है.......
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