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Sunday, August 15, 2010

आज़ाद ये फ़िज़ाएं हैं

                 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
साहेबान...
 सुबीर संवाद सेवा
ब्लॉग पर आदरणीय पंकज जी ने नाचीज़ की ग़ज़ल को अपने तरही मुशायरे में जगह दी है. और इतनी खूबसूरती से सजाया है कि बस देखते ही बनता है,
गुज़ारिश है कि एक बार देखिएगा ज़रूर
ये ग़ज़ल यहां भी आपकी खिदमत में हाज़िर है, मुलाहिज़ा फ़रमाएं

सुनहरे हर्फ़ों से उनकी लिखी कथाएं हैं
वो जिनके सदके में आज़ाद ये फ़िज़ाएं हैं

हुए शहीद जो, बलिहारी उनके जज़्बों पर
वतन परस्तों के दिल की यही सदाएं हैं

उठा सवाल यहां जब भी राष्ट्र भक्ति का
हैं वीर नर सभी, नारी वीरांगनाएं हैं

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं

वो जिन के अपने हुए हैं निसार सरहद पर
उन्हीं के हिस्से में आती यहां सज़ाएं हैं

ज़रूरतों की सलीबों को ढो रहे हैं हम
सुकून चैन नहीं ,सिर्फ़ वेदनाएं हैं

अता हैं बरकतें उनकों, जो कहते हैं शाहिद
”खुदा का शुक्र है, सब आपकी दुआएं हैं”






शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

38 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सुनहरे हर्फ़ों से उनकी लिखी कथाएं हैं
वो जिनके सदके में आज़ाद ये फ़िज़ाएं हैं
शाहिद जी, मतले से लेकर मक़ते तक, गज़ल का शब्द-शब्द ज़ेहन में उतरता चला गया. जब भी इतनी सुन्दर गज़ल पढती हूं, गहरे सोच में पड़ जाती हूं, कि इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है?
स्वधीनता दिवस की अनेक शुभकामनाएं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत गज़ल...सारी वेदनाएं व्यक्त कर गयी ...

इस्मत ज़ैदी said...

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं

वो जिन के अपने हुए हैं निसार सरहद पर
उन्हीं के हिस्से में आती यहां सज़ाएं हैं

ज़रूरतों की सलीबों को ढो रहे हैं हम
सुकून चैन नहीं ,सिर्फ़ वेदनाएं हैं

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल
हर शेर मुकम्मिल
मुबारक हो

वीनस केशरी said...

तरही मुशायरे की आज की पोस्ट पढ कर दिल खुश को गया
मेरा भी सलाम कबूल फ़रमाएं

एक बार फ़िर से बहुत बहुत बधाई कबूल करें

मत्ले से मक्ते तक का हर शेर लाजवाब

वीनस केशरी said...

गुरु जी प्रणाम,

फ़िर से हाज़िर हूं

आज सुबह जब से मोबाईल पर तरही का यह अंक पढा है

सोचता रहा हून कि क्या लिखूंगा कमेन्ट में

मगर जब कमेन्ट करने आया तो फ़िर से पोस्ट को पढ कर लौट गया

और अब ब्लोग जगत मे टहल कर फ़िर से आया हू तो भी कुछ सूझ नही रहा

शाहिद जी की गज़ल की तारीफ़ के लिये तो ऐसे ही शब्दों का टोटा पडा हुआ है उस पर आपकी दिलकश प्रस्तुति से स्थिति और भी...... दिक्कत पैदा हो गई है

रात भर मेह्नत करता हूं शायद कुछ शब्द सूझ जाएं जिससे अपने मनोभाव को व्यक्त कर सकूं

कल फ़िर से आता हूं ,,,,

शहरोज़ said...

सुनहरे हर्फ़ों से उनकी लिखी कथाएं हैं
वो जिनके सदके में आज़ाद ये फ़िज़ाएं हैं

हुए शहीद जो, बलिहारी उनके जज़्बों पर
वतन परस्तों के दिल की यही सदाएं हैं

बहुत खूब !

अंग्रेजों से प्राप्त मुक्ति-पर्व ..मुबारक हो!

समय हो तो एक नज़र यहाँ भी:

आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा : अज़ीमउल्लाह ख़ान जिन्होंने पहला झंडा गीत लिखा http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html

CS Devendra K Sharma said...

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं

bahut khubsurat gazal....

अता हैं बरकतें उनकों, जो कहते हैं शाहिद
”खुदा का शुक्र है, सब आपकी दुआएं हैं”

waah!!

sath me apka blog parichaya-'शाहिद' दिल मसाइल में उलझता है, ये ज़ुल्फों में नहीं...mast!!!

Udan Tashtari said...

बेहतरीन गज़ल!!

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

सादर

समीर लाल

हास्यफुहार said...

आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

एक एक शेर अनमोल है| बार बार पढ़ने को जी कर रहा है| गुरु जी के ब्लॉग पर भी पढ़ आया हूँ, बहुत खूबसूरती से सजाया है|

अरुण मिश्रा said...

behatareen gazal
ka tohfaa aazadi ki
saalgirah par.
Bahut badhai

नीरज गोस्वामी said...

ज़नाब आपकी ग़ज़ल हासिल-ऐ-तरही मुशायरा है...लाजवाब अशआर कहें हैं आपने...आपके ज़ज्बे को सलाम...
नीरज

शारदा अरोरा said...

देश-प्रेम के जज्बे से भरपूर ..ग़ज़ल रूह को छूती हुई ...लेख लिखने वाले , ग़ज़ल रचने वाले , सजाने वाले सबको आजादी का दिन बहुत बहुत मुबारक हो ।

जो टिप्पणी उधर दी वही यहाँ लिख रही हूँ ....दोनों जगह आप ही छाये हुए हैं ।

shikha varshney said...

अता हैं बरकतें उनकों, जो कहते हैं शाहिद
”खुदा का शुक्र है, सब आपकी दुआएं हैं”

वाह... बेहतरीन.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

जब खूबसूरत अशआर हो तो उसके लिये खूबसूरत बहार भी मौज़ूं होती है, जैसी गुरुवर ने बिखेरी।
देशभक्ति या देश के लिये कोई भी रचना मर्म को छूती है, और यही साबित करता है कि हममे भारत की जान बसती है।
अफसोस यह है कि
सुनहरे हर्फों से उनकी लिखी कथायें तो हैं मगर आज के नेता खुरच खुरच कर स्वर्ण हज़म कर रहे हैं। आज़ाद फिजाओं में आज भी आतंक का ज़हर है। आज भी अफसोस यह है शाहिद भाई कि भगत सिंह पैदा तो होना चाहिये मगर पडौस में, जैसी मानसिकता है।

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं..

काश, ऐसा ही हो...।
आपकी इस खूबसूरत सी गज़ल मैं मेरी वेदनाओं नें करेला घोला है किंतु दिल से कहता हूं आपके विचार, आपकी सोच..आपके अशआरों में..वतन परस्ती का ज़ज़्बा है..इसे सलाम।

Chinmayee said...

जय हिंद


http://rimjhim2010.blogspot.com/2010/08/blog-post_15.html

दिगम्बर नासवा said...

लाजवाब ग़ज़ल की जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है .... हर शेर वतन प्रेम के जज़्बे से भरा है ...
आपको स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ....

अनामिका की सदायें ...... said...

आपकी गज़लों की तारीफ करना तो सूरज को दीपक दिखाना है.

इस बार की गज़ल का विषय बहुत कमाल का और हर आशार ख़ूबसूरती के जामे में ढला.

कमाल की गज़ल.
बधाई.

ज्योति सिंह said...

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं

वो जिन के अपने हुए हैं निसार सरहद पर
उन्हीं के हिस्से में आती यहां सज़ाएं हैं

ज़रूरतों की सलीबों को ढो रहे हैं हम
सुकून चैन नहीं ,सिर्फ़ वेदनाएं हैं

अता हैं बरकतें उनकों, जो कहते हैं शाहिद
”खुदा का शुक्र है, सब आपकी दुआएं हैं”
मै आज भोपाल से लौटी तो वन्दना के घर गयी और उसने आपकी रचना पढ्ने को कहा और सबसे पहले आज़ादी के अवसर पर यही पहुंची ,और आते ही शुरुआत इतनी खूबसूरत गज़ल से हुई कि जश्न दुगुना हो गया ,जब सबके मन और विचार एक हो जाये तो भारत ही क्या सारा जहान अमन और एकता का पैगाम लिये होगा ,कोशिश ये हो हमारी ,अधूरी नही पूरी आज़ादी मिले ताकि एक बुलन्द आवाज़ मे हर दिल से ये स्वर गून्जे ’हम आज़ाद है’ .जय हिन्द .

MUFLIS said...

सुनहरे हर्फ़ों से उनकी लिखी कथाएं हैं
वो जिनके सदके में आज़ाद ये फ़िज़ाएं हैं

ऐसा खूबसूरत जज़्बा,,, बिलकुल पाक,,साफ़,,नेक
और ऐसी ही मुक़द्दस पाकीज़ा ग़ज़ल .... वाह
एक एक शेर अपनी मिसाल खुद हो गया है
एक अरसे के बाद ऐसी खूबसूरत गजल पढने को मिली है
हर बार हर काफ़िये को बड़ी सलीक़े से निभाया गया है
मुबारकबाद .

Babli said...

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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

chandrabhan bhardwaj said...

Shahid Bhai,Swatantrata Divas ki hardik shubh kamanaayen. Is mauke par apne behad khoobsoorat ghazal kahi hai iske liye bhi bahut bahut badhai. Apki ghazalen padkar dil ko sukoon milata hain.Punah badhai.

अल्पना वर्मा said...

हुए शहीद जो, बलिहारी उनके जज़्बों पर
वतन परस्तों के दिल की यही सदाएं हैं

-बहुत ही अच्छी लगी यह गज़ल.
सामायिक प्रस्तुति .
आपको भी स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ..

रचना दीक्षित said...

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं

वो जिन के अपने हुए हैं निसार सरहद पर
उन्हीं के हिस्से में आती यहां सज़ाएं हैं

कमाल की गज़ल. आपको स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ जय हिंद

फ़िरदौस ख़ान said...

सुनहरे हर्फ़ों से उनकी लिखी कथाएं हैं
वो जिनके सदके में आज़ाद ये फ़िज़ाएं हैं

हुए शहीद जो, बलिहारी उनके जज़्बों पर
वतन परस्तों के दिल की यही सदाएं हैं

बहुत खूब !

manu said...

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं


और...


वो जिन के अपने हुए हैं निसार सरहद पर
उन्हीं के हिस्से में आती यहां सज़ाएं हैं

ज़रूरतों की सलीबों को ढो रहे हैं हम
सुकून चैन नहीं ,सिर्फ़ वेदनाएं हैं

बेहद अच्छी शे'र लगे...

मक्ता बड़ा सोच के बांधा है...

देशभक्ति पर यूं मुसलसल ग़ज़ल कहना हमारे लिहाज से बेहद मुश्किल काम है...जिसे आपने बड़ी खूबसूरती से अंजाम दिया है...



अमिताभ जी के कमेन्ट हमेशा गौर से पढ़ते हैं..आज भी पढ़ा...सचमुच फ़िक्र करने की हालत है...

भगत सिंह पैदा तो हो....मगर पड़ोस में हो...

बबली जी का इतनी मेहनत से किया कमेन्ट भी बहुत अच्छा लगा...

गौतम राजरिशी said...

एक बेमिसाल ग़ज़ल शाहिद जी...तमाम तारिफ़ों से परे। गुरूदेव के ब्लौग पर ही हैरान रह गया था सारे के सारे अशआर की बुनावट देखकर। हर शेर को एक ही थीम पे रखना कितना मुश्किल है, समझ सकता हूं मैं और आपने इस मुश्किल को इतनी सहजता से निभाया है कि क्या कहूँ...

रमजान के पवित्र महीने की मुबारकबाद!

हरकीरत ' हीर' said...

पहले आपके दिए लिंक पे चली गयी .....जितनी तारीफ करूँ सुबीर जी की कम है ....हर शे'र को जिवंत कर दिखाया है उन्होंने .....
और मत्ले से लेकर मक्ते तक हर शे'र आज़ादी की दास्तां लिए हुए .....

उठा सवाल यहां जब भी राष्ट्र भक्ति का
हैं वीर नर सभी, नारी वीरांगनाएं हैं
ऐसे शब्द ..ऐसे ज़ज्बात एक सच्चे देशभक्त की कलम ही लिख सकती है .....

जय हिंद ....!!

JHAROKHA said...

shahid ji,
bahut hi koobsurat lagi aapki gazal.
visheshhh kar ye panktiyan-----

वो जिन के अपने हुए हैं निसार सरहद पर
उन्हीं के हिस्से में आती यहां सज़ाएं हैं

ज़रूरतों की सलीबों को ढो रहे हैं हम
सुकून चैन नहीं ,सिर्फ़ वेदनाएं हैं
poonam

सर्वत एम० said...

आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया.... दरअसल ब्लॉग पर कल ही गजल देखी थी और आप-धापी में में यह मान कर कि कमेन्ट दे चुका हूँ, वापस हो गया. अब दुःख तो हो रहा है, साथ ही अपने दिमाग पर हंसी भी आ रही है.
आपको कमेन्ट देना मुझे शायद दुनिया का मुश्किल तरीन काम लगता है. हिमालय को बार बार हिमालय कहते भी अच्छा नहीं लगता. इतने अल्फाज़ कहाँ से लाऊँ जो हर गजल, हर त्ख्लीक़ पर फ़र्क के साथ रच जाएँ.
हुब्बुलवतनी पर ऐसा कलाम, कम पढ़ने को मिलता है. सबसे बड़ी तारीफ की बात तो यह है कि आपने तरही मिसरे पर यह गजल कही. तरह में अमूमन बहुत अच्छे अशआर कम मिलते है क्योंकि तरह में शायर अपनी मर्जी से शेर नहीं कहता, तरही मिसरे कादबाव होता है उस पर.
आपने मिज़ाज को तरह के मवाफिक रखने में कामयाबी हासिल की, मुबारकबाद.

रश्मि प्रभा... said...

हुए शहीद जो, बलिहारी उनके जज़्बों पर
वतन परस्तों के दिल की यही सदाएं हैं
waah

Roshni said...

jajbaat hai har alfaaj main

Babli said...

रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सभी अशआर बहुत खूबसूरत हैं!
बहुत-बहुत बधाई!

बेचैन आत्मा said...

ज़रूरतों की सलीबों को ढो रहे हैं हम
सुकून चैन नहीं ,सिर्फ़ वेदनाएं हैं
..ये जज़्बात तो शुभानअल्लाह!
..बधाई.

Babli said...

काफी दिन हो गए आपने कोई नया पोस्ट नहीं किया! आपकी टिपण्णी के लिए शुक्रिया! मेरे ब्लॉग पर आते रहिएगा!

नीरज गोस्वामी said...

पंकज जी के ब्लॉग पर भी कहा और अब यहाँ भी कहता हूँ, ये ग़ज़ल पूरे मुशायरे की सबसे कामयाब ग़ज़ल रही...इसे हासिले मुशायरा ग़ज़ल कहने में कोई हर्ज़ नहीं है...इतने खूबसूरत शेर एक के बाद दूसरे कहने आसान नहीं होते लेकिन जब कलम शाहिद भाई के हाथों में हो तो ऐसे करिश्में होते ही रहते हैं...

सलामत रहें आप और आपकी कलम...आमीन...

नीरज

Mrs. Asha Joglekar said...

समझ तो ये है समझ लें सबब ग़ुलामी का,
सबक़ लें उन से जो हम से हुई ख़ताएं हैं

सही वक्त पर सही सीख वह भी गज़ल के अंदाज में, बहुत खूब ।