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Friday, September 17, 2021

इक ग़ज़ल

 

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बदलती रुत से तुम्हें कुछ गिला नहीं है क्या।

तुम्हारी अपनी कोई भी अना नहीं है क्या।।


बुलंदियों के नशे में कोई न होश न खौफ़

अमीरे-शहर का कोई ख़ुदा नहीं है क्या।।


छिपा के करता है हर शख़्स ये सफ़र सबसे

सफ़ीरे-इश्क़ को रहबर मिला नहीं है क्या।।


मैं कर रहा हूं ठिकाने की जुस्तजू कब से

तुम्हारे दिल का कोई रास्ता नहीं है क्या।


जहां दिमाग़ नहीं दिल की ही चले 'शाहिद'

तुम्हें वो इश्क़ अभी तक हुआ नहीं है क्या।।


शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

धागों में धागे

 क़ता

अम्न-अम्न कहकर जो सिर्फ़ लड़ाते हैं।

आज खिलाड़ी सफल वही कहलाते हैं।।

मज़हब और सियासत का है खेल यही

धागों में...धागे...उलझाए जाते हैं।।

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

जुदाई का यही लम्हा

 जुदाई का यही लम्हा ज़माने और भी देगा।

ख़ुदा मिलने मिलाने के बहाने और भी देगा।।


बिछड़ते वक़्त होटों पर अगर हैं दर्द के नग़मे

बदलता वक़्त ख़ुशियों के तराने और भी देगा।।

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

तस्वीर पुरानी क्या देखी

 एक क़ता

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आधी अधूरी एक कहानी क्या देखी

तन्हा तन्हा गुज़री जवानी क्या देखी

मुझको घेर के बैठ गईं तेरी यादें

अपनी इक तस्वीर पुरानी क्या देखी


शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

एक मतला एक शेर

 अलग-अलग रंग में एक मतला-एक शेर

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सियासी लोग लेते ही नहीं हैं काम पानी से।

बुझाना चाहते हैं आग भी शोला बयानी से।।


वो कुछ किरदार रुसवाई के भी लिक्खे गए वरना

जहां को काम ही क्या था तेरी-मेरी कहानी से।।


शाहिद मिर्ज़ा शाहिद