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Saturday, October 2, 2010

जज़्बात : एक साल का सफ़र

लीजिए हज़रात...
एक साल का हो गया जज़्बात... और एक प्यारी सी गुड़िया ने विश भी इस अंदाज़ में किया
ज़रा पहचानिए तो....
ये  अनुष्का (रानी विशाल) है...
शुक्रिया अनुष्का... खुश रहो


जी हां...आज
यानी गांधी जयंती के अवसर पर
ठीक एक साल पहले शुरू हुआ था जज़्बात का सफ़र
बस यूं ही...कुछ तलाश में...शायद अपनी ही तलाश में आया...
और इतना कुछ पा गया...कि यक़ीन ही नहीं हो रहा है.
ये सब आप साहेबान की
मुहब्बत
 इनायत
 और हौसला अफ़ज़ाई की ज़िन्दा मिसाल है
उम्मीद है आपकी नज़रे-इनायत इसी तरह ज़ारी रहेंगी
एक बात और
आम तौर पर जज़्बात पर महीने में एक ग़ज़ल पोस्ट की जाती रही है...
इस बार सिर्फ़ 6 दिन के अंदर ये तीसरी पोस्ट आपके सामने है
ये दो पोस्ट भी देखिएगा...
अम्न की राह में

और
हिफ़ाज़त करेंगे हम
अब
कोशिश रहेगी कि महीने में कम से कम दो पोस्ट आपकी खि़दमत में हाज़िर की जा सकें...


लीजिए पेश है जज़्बात के एक साल के सफ़र के मौके पर एक ताज़ा ग़ज़ल

मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
(नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें- सब एक ही कुनबे से हैं)

48 comments:

सुमन'मीत' said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

बहुत सुन्दर........शाहिद जी .आपको ब्लॉग की सालगिरह मुबारक हो..........

इस्मत ज़ैदी said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

बहुत ख़ूब !
वाक़ई ब्लॉग की दुनिया ने कितने साथी अता किये हमें ,
ब्लॉग का एक साल पूरा होने की मुबारक बाद क़ुबूल कीजिये

रानीविशाल said...

जज़्बात की सालगिरह बहुत बहुत बहुत मुबारक हो ...शायरी का यह सुहाना हमेशा इसी तरह चलता रहे !

अनुष्का रानीविशाल

रानीविशाल said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में
इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

वाह ! क्या कहा जाए हर एक शेर बहुत नायाब है इस बेशकीमती ग़ज़ल का बहुत गहरा मर्म है हर शेर में ....आभार
एक बार फिर इस वर्षगाँठ पर ढेरों बधाई और शुभकामनाएँ !!

ali said...

बढ़िया ! मुबारक बाद !

शारदा अरोरा said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में
बहुत सुन्दर , आपको ब्लॉग की सालगिरह बहुत बहुत मुबारक हो .

Majaal said...

मिलते रहते है हमको, नए फनकार रोजाना,
छानना बाकी है बहुत, अभी ब्लॉग-ए-दीवान में ..

मुबारक.. और लिखते रहिये ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जज़्बात की सालगिरह की बहुत बहुत बधाई ...हमेशा यहाँ बहुत खूबसूरत गज़ल पढ़ने को मिली हैं ...आज की गज़ल भी बहुत खूब कही है ...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में.

बहुत बहुत शुक्रिया ..

manu said...

ग़ज़ल देखने फिर आयेंगे...
अभी तो सारा वक़्त वीडियो देखने में ही झोंक दिया...कई बार देखा...पर दिल नहीं भरा...
बहुत प्यारा अंदाज...
जियो बेटा...

अनामिका की सदायें ...... said...

मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

बहुत उत्साहित कर देने वाले भावो से ओत-प्रोत गज़ल. बधाई.और बधाई एक वर्ष का सफर पूरा करने के लिए.

संजय भास्कर said...

जज़्बात की सालगिरह बहुत बहुत बहुत मुबारक हो

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में
सच है. आसमान ने हमें अनगिनत बुलंदियां बख़्शीं हैं, उन्हें छूने की कोशिश हमें करनी है.
ब्लॉग की सालगिरह पर अनगिन शुभकामनाएं. आप इसी तरह कामयाब होते रहें, और हमें अपनी नायाब ग़ज़लों से मालामाल करते रहें.

शरद कोकास said...

मुबारक हो

दिगम्बर नासवा said...

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में ..

शाहिद साहब ... गाँधी जयंती और शास्त्री जी का जनम दिन और आपके ब्लॉग का पहला जनम दिन ..... सब मुबारक ....

बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है ... आपका लिखा हमेशा कुछ नया एहसास लिए होता है ....
ये शेर बहुत कमाल का लगा है ... जीवन की सच्चाई से जूझता हुवा ...

रश्मि प्रभा... said...

मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में
kamyabi kee raahen ujjwal rahen

MUFLIS said...

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

साल गिरह के मुबारक मौक़े पर
ऐसी खूबसूरत ग़ज़ल
तोहफे में देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया .
मेरी जानिब से भी मुबारकबाद ...

हरकीरत ' हीर' said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

दुआ है आप यूँ ही आसमान की ऊंचाइयों को छूते रहे .....
और हर साल ये साल गिरह मनाते रहे .....बधाई ....!!

rashmi ravija said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में
बहुत खूब....
ब्लॉग की सालगिरह मुबारक हो...

shikha varshney said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

खूबसूरत गज़लों का घर है ज़ज्बात ..इसकी सालगिरह बहुत बहुत मुबारक हो.दिन दुनी रात चौगनी उन्नति करे.

kumar zahid said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में

बेहद खूबसूरत गजल!!
यूं पूरी ग़ज़ल का मिजाज ही नफरत परस्तों के लिए एक हुंकार है। काश अलगाववादियों के पास अम्नोअमान का सलीका होता!

Babli said...

ब्लॉग की सालगिरह बहुत बहुत मुबारक हो! आपको हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में...
वाह! बहुत खूब! सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!

ज्योति सिंह said...

bahut bahut badhai is khoobsurat safar ke ek barsh poore karne par ,aapki rachna to har baar hi shaandaar hoti hai ,na bhulane wali .इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

अनूप शुक्ल said...

सालगिरह की बहुत-बहुत बधाई! आगे के सफ़र के लिये शुभकामनायें।

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

खूबसूरत!
शाहिद साब मुबारक हो!
अच्छा लगा जानके के आप मेरठ से हैं.
आशीष
--
प्रायश्चित

नीरज गोस्वामी said...

शाहिद भाई देर हुई आने में हमको शुकर है फिर भी आये तो...:)) आ कर अनुष्का बिटिया के साथ सुर में सुर मिला कर तालियाँ बजा बजा कर आपके ब्लॉग के जनम दिन की बधाइयाँ गा रहे हैं...दुआ करते हैं के ये ब्लॉग सालों साल इसी तरह चलता रहे चलता रहे चलता ही रहे...अनवरत...
आपकी गज़ल पर क्या कहूँ...सुभानअल्लाह...आप जब भी लिखते हैं कलेजा निकाल लेते हैं...:))

नीरज

' मिसिर' said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

बहुत बहुत मुबारक हो !

manu said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में...

इर्ष्या पैदा करने की हद तक खूबसूरत शे'र....
कोई भी पढ़े तो आह करके कहे..

काश...
ये शे'र हमसे हुआ होता...

blog ki saalgirah mubaarak...

JHAROKHA said...

ek bahut hi khoob-surat gazal ke saath hi saath aapko jajbaat ka ek saal pura hone par aapko hardik badhai.
poonam

kshama said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

Dua hai,hamesha aisehi hamsafar milen!
Blogke saalgirah kee dheron shubhkamnayen!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

सालगिरह की बहुत बहुत बधाई ...यहाँ हमेशा खूबसूरत गज़ल पढ़ने को मिली हैं ...

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल !

सुनील गज्जाणी said...

happy birth day dear '' zazbaat '' shahid bhai aap mubarak baaad kabul kijeyega ,
कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में
har sher umda hai magar meri pasand ka aap ki nazar hai ,
shukariya

Mrs. Asha Joglekar said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

बढिया गज़ल ।
आसमान में मंजिलें नही होती कितना अच्छा है आप नई नई मंजिलें अपनी खुद की बनाये और लिखते रहें । हमें आपको पढने का आनंद देते रहें । साल पूरा करने पर अनेक मुबारकें । आपको जिसकी तलाश है वह भी मिल जाये ।

singhsdm said...

शाहिद भाई
सबसे पहले तो एक साल का ब्लॉग-सफ़र मुबारक......खुदा करें आपकी कलम यूँ ही चलती रहे
एक साल के अवसर पर आपकी यह ग़ज़ल पिछली ग़ज़लों की तरह ही दिल पर छा गयी.....
मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में
क्या मतला गढ़ा है, हुज़ूर........!

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में
नए लफ़्ज़ों में ढले इस शेर के क्या कहने........बहुत खूब.....वाह वाह !

मक्ता तक का सफ़र बहुत प्यारा है.......
शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

देवेन्द्र पाण्डेय said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में
..बहुत खूब।
आपके जज़्बात का कद्र करता हूँ।

अल्पना वर्मा said...

'कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में'
-बहुत उम्दा बात कही है.
बहुत अच्छी ग़ज़ल है.
-ब्लॉग की सालगिरह पर बहुत बहुत बधाई.
शुभकामनाएँ.

निर्मला कपिला said...

आपकी पोस्ट आये और मुझे पता न चले मेरे लिये तो शर्म की बात है और वो भी बधाई देने के वक्त पर्! शायद ब्लाग लिस्ट देखने मे भूल हो गयी।
आपको ब्लाग की सालगिरह पर बहुत बहुत बधाई। बहुत ऊँचा मुकाम पायें। ये तो खुशी की बात है कि एक माह मे दो पोस्ट्ज़ पढने को मिलेंगी। हमे तो बहुत कुछ सीखने को मिल जायेगा। एक बार फिर से बधाई कबूल करें। शुभकामनायें।

निर्मला कपिला said...

गज़ल के बारे मे तो कहना ही भूल गयी वैसे मेरे कहने से तो कहीँ ऊपर होती है आपकी गज़ल।

मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में


शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में
तीनो लाजवाब। बेशक मुझे एनाद, बुग्ज़ का अर्थ नही मालूम मगर आपका भाव समझ आ गया। बहुत खूब। लाजवाब गज़ल। बधाई।

हरकीरत ' हीर' said...

शाहिद जी एक बार फिर जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं .....!!

adbiichaupaal said...

नफ़रत, एनाद, बुग़्ज़, तआस्सुब, अदावतें
ख़तरे कई तरह के है अम्नो-अमान में

भाई, मज़ा आ गया आपकी शायरी पढ कर. काफ़ी मेहनत करते है आप.

Kunwar Kusumesh said...

मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

आपकी ग़ज़ल का एक एक शेर कह रहा है की आप माहिरे फन हैं .
मत्ला और हुस्ने मत्ला कमाल का है.
आपने मेरे ब्लॉग पे मेरी ग़ज़ल पढ़ी , पसंद की, शुक्रिया.

कुँवर कुसुमेश

ZEAL said...

इस रहगुज़र में ऐसे भी कुछ हमसफ़र मिले
पाया बहुत सुकून सफ़र की थकान में

शाहिद तलाश जिनकी थी वो ही न मिल सके
अपने बहुत मिले हैं मगर इस जहान में...

Beautiful couplets !

.

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

Udan Tashtari said...

देर से आने के लिए क्षमाप्रार्थी...


ब्लॉग की सालगिरह मुबारक हो.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

भाईजान शाहिद मिर्ज़ा शाहिद जी
आदाब !
कितनी बार इस पोस्ट पर आया , आपके अश्'आर में इतना मगन हो जाता हूं कि बिना कुछ कहे ही लौटता रहा …
इससे पहले कि आज फिर आपके फ़न का ज़ादू पूरी तरह गिरफ़्त में ले…
~*~जज़्बात की पहली सालगिरह पर मुबारकबाद~*~
क़बूल फ़रमाएं !

… और ग़ज़ल का एक एक शे'र नगीना है , ख़ुद की ख़ुशी के लिए मतला दुहरा रहा हूं -

मुश्किल ये दौर काट ज़रा इत्मिनान में
होती है कामयाबी नेहां इम्तहान में


बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Priyanka Soni said...

कितनी खूबसूरत गज़ल !
बस वाह! वाह! वाह !

वन्दना अवस्थी दुबे said...

विजयादशमी की अनन्त शुभकामनाएं.

इस्मत ज़ैदी said...

कितनी बुलंदियों को छुओगे उड़ान में
मज़िल कोई बनी ही नहीं आसमान में

वाह!
जी मुझे इस शेर के लिये दोबारा आना ही था जो पिछली बार छूट गया था,
बहुत ख़ूब!

Asha said...

पहली बार आप के ब्लॉग पर आई हूं |जज्बात की सालगिरह पर बधाई |
आशा